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पृथ्वी पर फैली बुराइयों का अंत केवल प्रकृति एवं गो संवर्धन से ही संभव:- करूणागिरी महाराज

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श्रीडूंगरगढ़ टुडे 28 अक्टूबर 2025

दुलचासर गांव के मीठिया कुंआ चौपाल स्थित माहेश्वरी भवन में नानकराम मूंधड़ा परिवार के विकेश व सोनल मूंधड़ा के सौजन्य से चल रही भागवत कथा के पांचवें दिन मंगलवार को भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं समेत छप्पन भोग व गोवर्धन पूजा के प्रसंगों का विस्तार से श्रवण कराया गया। कथावाचिका महामंडलेश्वर साध्वी करूणागिरी महाराज ने गोवर्धन पूजन के महत्व को विस्तार से बताते हुए कहा कि गोवर्धन का अर्थ है गो संवर्धन। भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत मात्र इसीलिए उठाया था क्योंकि पृथ्वी पर फैली बुराइयों का अंत केवल प्रकृति एवं गो संवर्धन से ही हो सकता है। सभी ब्रजवासी तरह-तरह के पकवान बना रहे है और पूजा का मंडप सजाया जा रहा है। तब श्री कृष्ण जी के पूछने पर मईया यशोदा ने बताया कि सभी ब्रजवासी इंद्र देव के पूजन की तैयारी कर रहे है। तब कन्हैया ने कहा कि सभी लोग इंद्रदेव की पूजा क्यों कर रहे है, तो माता यशोदा उन्हें बताते हुए कहती है, क्योंकि इंद्रदेव वर्षा करते है और जिससे अन्न की पैदावार अच्छी होती है और हमारी गायों को चारा प्राप्त होता है। इस पर श्री कृष्ण भगवान ने कहा कि वर्षा करना तो इंद्रदेव का कर्तव्य है। यदि पूजा करनी है तो हमें गोवर्धन पर्वत की करनी चाहिए, क्योंकि हमारी गायें तो वहीं चरती है और हमें फल-फूल, सब्जियां आदि भी गोवर्धन पर्वत से प्राप्त होती है। इस बात को देवराज इंद्र ने अपना अपमान समझा और क्रोध में आकर प्रलयदायक मूसलाधार बारिश शुरू कर दी।

जिससे हर ओर त्राहि-त्राहि होने लगी। सभी अपने परिवार और पशुओं को बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। तब भगवान कृष्ण ने इंद्रदेव का अंहकार दूर करने और सभी ब्रजवासियों की रक्षा करने हेतु गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया। तब सभी ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण ली। इसके बाद इंद्रदेव को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण से क्षमा याचना की। इसी के बाद से गोवर्धन पर्वत के पूजन की परंपरा आरंभ हुई।

कथावाचिका ने कहा कि भगवत कथा का श्रवण करने से जीवन में सुख-शांति का समावेश होता है। जहां भी जिस समय भी भागवत कथा सुनने का अवसर प्राप्त हो, इस अवसर को कभी भी नही छोड़ना चाहिए। उन्होने कहा भगवान अभिमानियों का अभिमान मर्दन करने में थोड़ा भी बिलंब नहीं करते है। अहंकार ही उनका भोजन है। इंद्र अहंकार में आकर प्रलयकारी वृष्टि करते है। भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र का मान नष्ट करके गिर्राज पूजा करवाई । तब सभी बृजवासियों ने गोवर्धन पर्वत का पूजन किया और छप्पन भोग लगाया। कथावाचिका ने कहा कि आज भी वृदांवन में बांके बिहारी को दिन में आठ बार भोग लगाया जाता है। पूरे सात दिन भगवान श्रीकृष्ण ने भूखे प्यासे रहकर गोवर्धन पर्वत को उठाए रखा था। कथावाचिका ने भगवान कृष्ण की विभिन्न बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि कालिया नाग का संहार करके थयमुना जी को पवित्र किया, पूतना और बकासुर जैसी मायावी शक्तियों का अंत किया।कथा में छप्पन भोग सजाया गया और भगवान को भोग लगाया गया और धूमधाम से नंदोत्सव मनाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या मेंं श्रद्धालु श्रोतागण कथा सुनने पहुंचे। बुधवार को कथा में श्रीकृष्ण-रूखक्मणी विवाहोत्सव मनाया जाएगा।

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