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प्रवासी नागरिकों ने हर्षोल्लास के साथ मनाया गणगौर का पर्व, निभाई शादी की सारी रस्में, महिलाएं हुई भावुक देखें येलहंका न्यू टाउन (बेंगलुरु) से विशेष फोटो  सहित खबर

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श्रीडूंगरगढ़ टुडे 24 मार्च 2026

श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र में तेजी से बढ़ता न्यूज पोर्ट श्रीडूंगरगढ़ टुडे अब बेंगलुरु दिल्ली कोलकाता, मुंबई,सूरत सहित विभिन्न राज्यों सहित विदेश  में भी अपनी अलग पहचान बना रहा है। बता देवें की प्रवासी नागरिकों की खबर श्रीडूंगरगढ़ टुडे प्रमुखता से प्रकाशित करता है। इसके लिए प्रवासी नागरिक धन्यवाद आभार ज्ञापित करते नजर आ रहे है। इसी क्रम मे श्रीडूंगरगढ़ टुडे की पाठक श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र के गांव हेमेरा निवासी मीनाक्षी सारस्वत हाल येलहंका न्यू टाउन (बेंगलुरु) ने गणगौर पर्व की विशेष फ़ोटोज उपलब्ध करवाते हुए बताया की राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक,पारम्परिक मातृ शक्ति आस्था,प्रेम एवं पारिवारिक सौहार्द्र के प्रतीक गणगौर पर्व भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित गणगौर का पर्व बेंगलुरु में धूमधाम से मनाया मीनाक्षी ने बताया कि यह त्योहार होली के दूसरे दिन से शुरू होकर 16 दिनों तक चलता है। यह विशेष रूप से कुंवारी कन्याओ वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं,और कुंवारी लड़कियां मनचाहा वर पाने के लिए पूजा करती है। कुंवारी लड़कियां इस दौरान व्रत रखती हैं। नवविवाहित महिलाएं अपने विवाह के पहले वर्ष में मायके जाकर गणगौर की पूजा करती हैं,इसलिए इसे सुहागपर्व भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार,चैत्र शुक्ल तृतीया को राजा हिमाचल की पुत्री गौरी का विवाह भगवान शिव से हुआ था। इसी की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है। त्योहार की शुरुआत में कन्याएं होलिका दहन की राख से गोबर के आठ पिंड बनाती हैं। इन पिंडों को दूब पर रखकर रोज पूजा जाता है। दीवार पर काजल और रोली का टीका लगाया जाता है। शीतलाष्टमी तक यह क्रम चलता है। इसके बाद मिट्टी से ईसर-गणगौर की मूर्तियां बनाकर पूजन किया जाता है। गणगौर की धूम सिर्फ राजस्थान तक ही सीमित नहीं है। जहां-जहां मारवाड़ी समुदाय के लोग रहते हैं,वहां भी यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। श्यामा सारस्वत श्रीडूंगरगढ़ हाल बेंगलुरु ने बताया कि येलहंका न्यू टाउन में गणगौर का पर्व धूमधाम से मनाया 16 दिन तक विभिन्न आयोजन हुए इस दौरान मारवाड़ी सहित बेंगलुरु सिटी के आस पास की महिलाओं ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया। ममता सारस्वत ने  बताया कि समय के साथ गणगौर उत्सव का स्वरूप भी बदल रहा है। जहां एक ओर पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया जा रहा है,वहीं दूसरी ओर आधुनिकता का रंग भी इस त्योहार में घुलता जा रहा है। पहले जहां गणगौर पूजन के दौरान महिलाएं और युवतियां पारंपरिक लोकगीत गाकर उत्सव मनाती थीं,वहीं अब डीजे और साउंड सिस्टम की धुनों पर नृत्य का चलन बढ़ गया है। अब गणगौर केवल पूजा तक सीमित नहीं रह गई,बल्कि इसमें हल्दी सेरेमनी,रिंग सेरेमनी और कलर थीम जैसे नए ट्रेंड जुड़ गए हैं। फिर भी परंपराओं के अनुसार आज भी दूर्वा और फोग (फुलड़ा) जैसी पारंपरिक पूजा सामग्रियां मायरा जैसी रीति-रिवाजों की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ निभाई जा रही है। परमेश्वरी देवी मोट निवासी बीनादेसर हाल बेंगलुरु ने बताया कि बदलाव परंपरा और आधुनिकता के मेल का प्रतीक है। गणगौर उत्सव अब केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव बन गया है,जो न केवल शहरों में बल्कि गांवों और ढाणियों में भी अपनी नई पहचान के साथ मनाया जा रहा है। कविता एंव गुनगुन सारस्वत ने बताया कि गणगौर का उत्सव महिलाएं व युवतियां ने बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया खूब नृत्य व विभिन्न प्रकार के आयोजन किये 16 दिन तक विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यजनों का माता को भोग लगाकर प्रसाद वितरण किया जाता साथ ही बनोरे के आयोजन हुए हल्दी,मायरा व मेंहदी की रस्में पूरी श्रद्धा से निभाई गई महिलाओं व युवतियों ने विभिन्न प्रकार के गणगौर के मंगलगीत गाए रविवार को हर्षोल्लास के साथ गीत गाते हुए गणगौर को मेंहदी लगाई गई। तथा सोमवार को ईसर गणगौर की पूजा के साथ गणगौर पर्व संपन्न हुआ। इस अवसर पर गहने-कपड़ों से सजी-धजी महिलाएं और युवतियां दूब लेकर बैंड-बाजों की धुन पर नाचती हुई गणगौर व ईशर को विदाई दी। युवतियों ने इच्छित वर की कामना तथा विवाहिताओं ने पति की लंबी उम्र की कामना के साथ पूजन संपन्न किया। इस दौरान मीनाक्षी सारस्वत हेमेरा, चंद्रकला,ममता,श्यामा सारस्वत श्रीडूंगरगढ़ परमेश्वरी देवी, उर्मिला,खुशी सारस्वत बीनादेसर सुधा, कविता, गुनगुन सारस्वत, सन्ध्या, अंजनी शर्मा, रेखा मिस्त्री, भावना सोनी, रामकन्या देवी, ज्योति, कौशल्या जांगिड़ सहित अनेक महिलाएं शामिल हुई। ज्योति जांगिड़ ने बताया कि विदाई के समय कुछ युवतियों व महिलाएं भावुक हो गई।

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